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आदिवासी महिलाओं को संपत्ति पुरुषों की तरह पिता के संपत्ति में अधिकार मिले : सलखान मुरमू

जमशेदपुर। आदिवासी महिलाओं को भी पुरुषों की तरह पितृ संपत्ति में अधिकार मिले। आदिवासी सेंगेल अभियान (सेंगेल) संविधान के अनुच्छेद 14 ( कानून के समक्ष बराबरी का मौलिक अधिकार) और अनुच्छेद 21 ( प्रतिष्ठा के साथ जीने का मौलिक अधिकार) के तहत इसका समर्थन करती है। परंतु सुप्रीम कोर्ट के उस टिप्पणी का समर्थन नहीं करती है जिसमें कहा गया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम- 1925 की धारा 2 (2) के प्रावधानों में संशोधन कर केंद्र सरकार आदिवासी महिलाओं को भी संपत्ति पर अधिकार प्रदान करें। अर्थात आदिवासी महिलाओं को जबरन हिंदू धर्म में समाहित करते हुए अधिकार प्रदान करें।
ज्ञातव्य हो कि हिंदू मैरिज एक्ट- 1955 और हिंदू उत्तराधिकार कानून-1925 के प्रावधानों में सिख, जैन बौद्ध की तरह आदिवासी शामिल नहीं है। अर्थात आदिवासी जन्मजात हिंदू नहीं है, बल्कि प्रकृति पूजक हैं। जिसे वर्तमान अधिकांश प्रकृति पूजक आदिवासी “सरना धर्म कोड” के नाम पर मान्यता आंदोलन के साथ खड़े हैं। मान्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा जबरन आदिवासियों को हिंदू बनाने का प्रयास हमारी धार्मिक आजादी (मौलिक अधिकार अनुच्छेद- 25) के खिलाफ है। परन्तु परंपरा, प्रथा, रूढ़ि आदि के नाम पर भारत के संविधान का विरोध करना आदिवासी जनमानस के लिए भी सही नहीं है। जिसका अमान्य होना लाजिमी है। जैसे तीन तलाक की प्रथा और सबरीमाला मंदिर में महिला प्रवेश निषेध की परम्परा पर सुप्रीम कोर्ट का रोक। लेकिन आदिवासी जनमानस की सुरक्षा और संवर्धन के लिए कतिपय अपवादों और उपन्तरणों – पांचवीं अनुसूची , पार्ट बी , 5 (1), का अनुपालन जरूरी है। जैसे यहां उन आदिवासी महिलाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जा सकता है यदि वे गैर आदिवासी मर्दों के साथ शादी का संबंध बनाते हैं। ताकि आदिवासी का संपत्ति गैर आदिवासी के हाथ छल, बल, कपट से हस्तांतरित न हो जाए।
समान नागरिक संहिता का मामला भी पेचीदा है। आंख मूंद कर बिरोध न समर्थन। आदिवासी समाज को सोच समझ कर कदम बढ़ाना है।

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