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बिहार की जनता की नजर में अब वह सुशासन बाबू काम,बल्कि पलटूराम की छवि से अधिक लैस है: लक्ष्मी सिन्हा

बिहार (पटना) समाजसेवी श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने कहा कि बिहार में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर जिस तरह कुछ ही घंटे के अंदर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उससे एक बार पुनः यह स्पष्ट हुआ कि उनके लिए राजनीतिक मूल्यों-मर्यादाओं का कोई महत्व नहीं। अपनी सत्ता बचाने और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने राजद से नाता तोड़कर भाजपा से हाथ मिलाया हो। वंह यह काम पहले भी कई बार कर चुके हैं और इस बारे में कहना कठिन है कि वह अंतिम बार पाला बदल रहे हैं। पिछली बार उन्होंने जब भाजपा से नाता तोड़कर राजद से हाथ मिलाया था तो वह अपने इस फैसले के पीछे कोई ठोस कारण नहीं गिना सके थे। इस बार भी वह यह स्पष्ट करने में नाकाम रहे की फिर से पाला क्यों बदल रहे हैं। उन्होंने केवल इतना ही कहा कि कुछ ठीक नहीं चल रहा था। ऐसा लगता है कि वह इससे क्षुब्ध थे कि कांग्रेस ने उन्हें आइएनडईआइए का संयोजक नहीं बनाया। यह मानने के अच्छे- भले कारण है कि वह विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दादा दावेदारी आगे बढ़ना चाहते थे। वह इसके पहले भी प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। कहना कठिन है कि अब वह प्रधानमंत्री पद पाने की अपनी आकांक्षा का परित्याग कर चुके हैं। आगे श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने कहा कि नीतीश कुमार ने जिस तरह एक बार फिर पाला बदलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की, उससे उनकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयत को चोट पहुंचाना तय है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कुछ समय में मुख्यमंत्री के रूप में सुशासन बाबू की उनकी छवि कमजोर हुई है। इतना ही नहीं, उनका जनाधार भी काम होते हुए दिखा है। इस समय जदयू संख्या बल के मामले में तीसरे नंबर का दल है, लेकिन बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां कुछ ऐसी है कि वह बार-बार पाला बदल कर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहते हैं। भले ही उनके समर्थक उनके जय-जयकार कर रहे हों, लेकिन बिहार की जनता को उनका इस इस तरह बार-बार पाला बदलना शायद ही रास आए। बिहार की जनता की नजर में वह सुशासन बाबू काम, बल्कि पलटूराम की छवि से अधिक लैस है। जिस तरह नीतीश कुमार तमाम सवालों से गिरे हैं, उसी तरह कुछ सवाल भाजपा के समक्ष भी है। यह ठीक है कि भाजपा ने यह सोच कर नीतीश कुमार का फिर से साथ देना पसंद किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसे बिहार में अधिकाधिक सीटें हासिल करने में आसानी होगी, लेकिन यदि नीतीश सरकार अपने कामकाज से राज्य की जनता को संतुष्ट नहीं कर सकी तो इसका नुकसान भाजपा को भी उठाना पड़ सकता है। जदयू और भाजपा, दोनों को ही इन सवालों का जवाब देना भी कठिन होगा कि उनकी ओर से बार-बार यह कहने के बाद फिर से हाथ क्यों मिला लिया गया कि अब कभी एक-दूसरे का साथ नहीं लिया जाएगा।

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