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महात्मा बुद्ध कहते हैं कि मनुष्य अपनी ही तरह सबका सुख-दुख जानकर न तो खुद किसी को मारे और न दूसरों को मारने के लिए उसकाए : लक्ष्मी सिन्हा

बिहार पटना राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी सह प्रदेश संगठन सचिव महिला प्रकोष्ठ श्रीमती लक्ष्मी सिन्हा ने बुद्ध जयंती के अवसर पर संपादक बंधुओं से बातचीत में कहा कि बुद्ध पुर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महापरिनिर्वाण भी हुआ था। महात्मा बुद्ध ने जीवन जीने के अनेक सूत्र भी दिए हैं। ‘धम्म पद’ में इनका सुंदर संकलन मिलता है। मनुष्य के आचरण के लिए मन की प्रधानता बनाते हुए वह कहते हैं,’सब कुछ मन से शुरू होता है और मनोमय है। अगर कोई दृष्ट मन से बोलता या करता है दुख उसका पीछा करता है। वैसे ही जैसे बैलगाड़ी का पहिया उसे खींचने वाले भाई के पीछे-पीछे चलता है। इसके विपरीत यदि कोई प्रसन्न मन से बोलता है या कुछ करता है तो सुख उसके पीछे-पीछे अनुसरण करता है। जैसे आदमी की परछाई उसके साथ-साथ रहती है। यदि मन में किसी के प्रति कोई गांठ बांध ली जाए तो उसके प्रति द्वेष या बैर भाव कभी कम नहीं होता।’श्रीमती सिन्हा ने कहा कि महात्मा बुद्ध का दृढ़ विचार है की अबैर से ही बैर समाप्त होता है। वह कहते हैं कि पृथ्वी पर सभी प्राणियों का जीवन नश्वर है, परंतु अक्सर लोग यह बड़ा तथ्य भूल जाते हैं। जो यह जानता है कि इस दुनिया से विदाई अनिवार्य है, उसके मन में दूसरों के प्रति कटुता दूर हो जाती है, आसकि्त जैसी अग्नि नहीं रहती और द्वेष जैसा मल भी नहीं एकत्र होता है। इसी तरह यदि जीवन में अपरिग्रह यानी जरूरत से ज्यादा संग्रह न करना आ जाए तो लोग सुखी जीवन बिता सकेंगे। पारस्परिक संबंधों के बारे में धम्म पद में कहा गया है कि ‘विजय से दूसरे के साथ बैर जन्म लेता है और पराजित आदमी दुख नींद सोता है, किंतु जो जाए और पराजय, दोनों से परे रहते है वह चैन से सुख की नींद सोता है। शांति से बड़ा कोई सुख नहीं होता। महात्मा बुद्ध कि सीख है की अक्रोध से क्रोध को, भलाई से दुष्ट को, दान से कंजूस को आप सच से झूठ को जितना चाहिए। चुंकि सबको अपना जीवन प्रिय होता है और सब जीव अपने लिए सुख की कामना करते हैं इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि मनुष्य अपनी ही तरह सबका सुख-दुख जानकर न तो दुख किसी को मारे और न दूसरों को मारने के लिए उकसाए। आगे श्रीमती सिन्हा ने कहा कि मनुष्य जीवन में स्वास्थ्य आज सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इस संदर्भ में जीवनचर्या पर महात्मा बुद्ध के विचार ध्यान देने योग्य है।वह संतोष को सावाधिक महत्व का बताते हैं आप इच्छा, मोह,राग और द्वेष की उन्होंने सबसे बड़े दोषों के रूप में पहचान की है। वह कहते हैं कि मनुष्य को शीलवान,समाधियां, उद्यमशील और प्रज्ञावान होकर जीना चाहिए। वह सत्य को सबसे पहला धर्म कहते हैं और धर्म का आचरण निष्ठा से करने की हिदायत देते हैं। महात्मा बुद्ध के शब्दों में मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है। उसे दुख ही अपने आप को प्रेरित करना चाहिए। वह स्वयं अपनी चौकीदारी करें। वह स्वयं ही अपनी गति है। इसके लिए अपने को समय की शिक्षा देनी होगी। अपने आपको जीतने वाला आत्म-जयी सबसे बड़ा विजेता होता है। जिसका चित्त स्थिर नहीं, जो सद् धर्म को नहीं जानता और जिसकी श्रद्धा डांवाडोल है, उसकी प्रज्ञा परिपूर्ण नहीं हो सकती। योग से प्रज्ञा की वृद्धि होती है। जिसे प्रज्ञा नहीं होती उसे ध्यान नहीं होता। जिसे ध्यान नहीं होता उसे प्रज्ञा नहीं होती। बौद्ध चिंतन में व्यक्ति के उत्कृष्ट रूप को ‘बोधिसत्व’ कहा गया है। बोधिसत्व वह व्यक्ति होता है, जो अपने लिए नहीं बल्कि प्राणीमात्र को कल्याण के मार्ग पर लाना चाहता है। वह अपने दुखों से ही नहीं पार पाना चाहता, बल्कि सबके दुख की निवृत्ति उसका लक्ष्य होता है। उसका ज्ञान उसे संसार से विरत नहीं करता। वह अपने सामने की कठिनाइयों और संघर्षों से मुठभेड़ कर उन पर विजय के लिए अग्रसर होता है। बोधिसत्व लोकोपकार मैं तत्पर रहता है। सब जीवों के कल्याण के लिए त्याग ही उसका अभीष्ट होता है। जैसे कि नालंदा के आचार्य शांतिदेव ने ‘ बोधिचर्यावतार’ मैं कहा है,’दूसरे प्राणियों को दुख से छुड़ाने में जो आनंद का अपार समुंद्र उमड़ता है वही सब कुछ है, केवल अपने लिए नीरस मोक्ष प्राप्त करने में क्या रखा है। आज के अस्त-व्यस्त समय की अंधेर भरी त्रासद घड़ी में ये विचार शीतल प्रकार की तरह शांति और ऊर्जा देती हैं।

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