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कभी गिरना तो कभी खुद…


मनीष सिन्हा
सिखा न सकीं जो उम्र भर तमाम किताबें मुझे,
करीब से कुछ चेहरे पढ़े और
न जाने कितने सबक सीख लिए..

नियती के बनाए मार्ग पर चलना ही होगा,
सुख दुख में हंसना तो कभी रोना ही होगा।

आएंगी ऊंची नीची ढलानें भी राह में अक्सर,
कभी गिरना तो कभी खुद संभलना ही होगा।
मिलेंगे न जाने कितने ही पराए राहों में,
पर अपनों के साथ तो रहना ही होगा।
जीवन की नैया भी डगमगाएगी बीच भंवर में,
संघर्ष की पतवार से लहरों को पार करना ही होगा।
कभी अपने कभी पराए कांटे बन चुभेंगे भी, पर कांटों के बीच में भी गुलाब सा खिलना ही होगा।

यात्रा न जाने कितनी लम्बी है जीवन की,
जीवन से मृत्यु तक ये यात्रा करना ही होगा।
नियती के बनाए मार्ग पर चलना ही होगा।
नियती के बनाए मार्ग पर चलना ही होगा।

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