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उर्दू पत्रकारिता के 200 वर्ष,इन 200 वर्षों में उर्दू पत्रकारिता के पतन के लिए कौन है ज़िम्मेदार ?

27 मार्च 1822 को पहला उर्दू अखबार जाम-ए-जहां नुमा कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था. जिसे हरिहर दत्ता ने निकाला था।

जमशेदपुर;अल-हिलाल  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा स्थापित एक साप्ताहिक उर्दू भाषा का समाचार पत्र था। यह अखबार भारत में ब्रिटिश राज की आलोचना और भारतीय मुसलमानों को बढ़ते भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए इसके प्रोत्साहन के लिए उल्लेखनीय था। अल-हिलाल 1912 से 1914 तक चला, जब इसे प्रेस अधिनियम के तहत बंद कर दिया गया था ।
अल-हिलाल ने खुद को एक बेहद लोकप्रिय समाचार पत्र के रूप में स्थापित किया। इसके पाठक वर्ग बंगाल , संयुक्त प्रांत और पंजाब तक फैले हुए थे ।मौलाना आजाद के अपने खाते से अखबार ने अफगानिस्तान में भी पाठकों को समर्पित किया था।उस समय, 25,000 से अधिक अखबार प्रकाशित कर उर्दू पत्रकारिता के लिए एक रिकॉर्ड बनाया।

मासूम मुरादाबादी ने एक किताब लिखी है ‘1857 की क्रांति और उर्दू पत्रकारिता’, जिसमें उन्होंने लिखा है कि, देश की पहली जंगे आज़ादी 1857 में उर्दू पत्रकारिता ने जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर दोबारा कब्ज़ा करने के बाद जिन लोगों को सब से पहले फांसी पर लटकाया उनमें ” देहली उर्दू अखबार,” के संपादक मौलवी मोहम्मद बाकर भी थे। दोष यह था कि उन्होंने अपने अख़बार में विद्रोहियों की हिमायत की थी . मौलवी मोहम्मद बाक़र देश की आज़ादी पर क़ुर्बान होने वाले प्रथम पत्रकार हैं.

आज उर्दू पत्रकारिता कहाँ खड़ी है और इसकी इस दुर्दशा के लिए कौन ज़िम्मेदार है इसकी समीक्षा होनी चाहिए।उर्दू पत्रकारिता आज दम तोड़ रही है और इसके पाठकों की संख्या लगातार कम हो रही है।वह उर्दू पत्रकारिता जिसकी शुरुआत कभी हरिहर दत्ता ने की थी आज समुदाय विशेष की भाषा बनकर रह गयी है।उर्दू पत्रकारिता जिसके कारण पहली बार अंग्रेजी हुकूमत को प्रेस अधिनियम उ पड़ा था और अंग्रेजी हुकूमत भयभीत हो गयी थी वह इन 200 वर्षों में आज क्या अपने इस गौरवशाली इतिहास के अनुरूप विकसित हो पायी है ? इसकी समीक्षा होनी चाहिए।भाषा पर किसी समुदाय विशेष की अजायेदारी नहीं होती।देश के स्वतंरता संग्राम में अग्रिम पंक्ति में रहकर आंदोलन को मजबूती प्रदान करने वाली उर्दू पत्रकारिता अपने अतीत पर गर्व अवश्य महसूस करती है परंतु भविष्य में उर्दू पत्रकारिता को वह गौरव तबतक हासिल नहीं हो सकता जबतक यह फिर से सभी भारतीयों की भाषा नहीं बन जाती।

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